6 अप्रैल को जनसुनवाई प्रस्तावित सरिया क्षेत्र में 4 नई डोलोमाइट खदानों की तैयारी, पुराने जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा फैसला

मौजूदा और बंद खदानों से नहीं लिया गया सबक, फिर से वही गलती
क्या प्रशासन लोगों को बीमारी और बर्बादी की ओर धकेल रहा है
सरिया तहसील के साल्हेओना – कटंगपाली और आसपास के गांवों में वर्षों से डोलोमाइट खदानों से फैल रहे प्रदूषण, बीमारी और कृषि नुकसान के बावजूद अब चार नई खदानों की स्वीकृति की तैयारी ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। ग्रामीण इसे प्रशासन और खनिज माफिया की मिलीभगत बताकर खुलकर विरोध कर रहे हैं।
साल्हेओना .
समीपवर्ती कटंगपाली, जोतपुर, बोंदा, मौहापाली और छेलफोरा क्षेत्र तहसील सरिया में डोलोमाइट खदानों से फैल रहे प्रदूषण और जनस्वास्थ्य संकट की कहानी कोई नई नहीं है। पिछले कई वर्षों से ग्रामीण धूल, प्रदूषण, बीमारी और बर्बाद होती खेती की मार झेल रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिन खदानों ने पूरे इलाके की हवा और पानी को जहरीला बना दिया, जिनकी वजह से किसानों की जमीनें बंजर हो रही हैं और लोगों के फेफड़े तक खराब हो रहे हैं, उन्हीं खदानों के बीच अब चार नई बड़ी डोलोमाइट खदानों के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति की तैयारी की जा रही है। यह मामला अब खुलेआम डोलोमाइट खदान विवाद बन चुका है और सवाल सीधे प्रशासन, खनिज विभाग और पर्यावरण विभाग की नीयत पर खड़े हो रहे हैं।
क्या प्रशासन खनन कंपनियों का एजेंट बन गया है
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ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन जनता का नहीं बल्कि खनन कंपनियों का एजेंट बनकर काम कर रहा है। गांवों के सरपंचों से यह कहकर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं कि केवल सूचना प्रसारित करनी है, जबकि असल में यह दस्तावेज जनसुनवाई प्रक्रिया से जुड़े हैं। इससे यह शक और गहरा हो गया है कि पूरी प्रक्रिया केवल औपचारिकता निभाने के लिए की जा रही है। गंभीर आरोप यह भी है कि कई जगह सरपंचों को पूरी जानकारी दिए बिना दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) रिपोर्टिंग की प्रतियां अंग्रेजी में उपलब्ध कराई गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकांश ग्रामीण अंग्रेजी समझते ही नहीं, ऐसे में यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता पूरी करने का तरीका बन गई है। इसी वजह से यह जनसुनवाई नहीं बल्कि “कागजी नाटक” बनकर रह गया है।
चार नई खदानों का प्रस्ताव, लाखों टन खनन की तैयारी
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जारी अधिसूचना के अनुसार तहसील सरिया में चार अलग-अलग कंपनियों और क्रशर संचालकों द्वारा नई डोलोमाइट खदानें शुरू करने की योजना है।
प्रस्तावित परियोजनाएं इस प्रकार हैं :
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आनंद कुमार अग्रवाल, ग्राम जोतपुर (बोंदा)
लीज एरिया: 4.8016 हेक्टेयर
उत्पादन क्षमता: 1,20,000 टन प्रति वर्ष
शुभ मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड, संचालक प्रतीश कुमार गोयल, ग्राम कटंगपाली
लीजिये एरिया: 2.881 हेक्टेयर
उत्पादन क्षमता: 1,50,000 टन प्रति वर्ष
मंगल मेटल, संचालक प्रतीश कुमार गोयल, ग्राम छेलफोरा
लीज एरिया: 1.927 हेक्टेयर
उत्पादन क्षमता: 1,14,160 टन प्रति वर्ष
बालाजी माइंस एंड मिनरल्स, पार्टनर अंकुर कुमार गोयल, ग्राम जोतपुर
लीज एरिया: 4.26 हेक्टेयर
उत्पादन क्षमता: 2,00,114 टन प्रति वर्ष
6 अप्रैल को संयुक्त जनसुनवाई प्रस्तावित
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इन खदानों के लिए 6 अप्रैल को ग्राम पंचायत बोंदा के सहकारी समिति परिसर में सुबह 10 बजे संयुक्त जनसुनवाई प्रस्तावित है। लेकिन जिस इलाके में पहले से दर्जनों खदानें पर्यावरण को बर्बाद कर चुकी हैं, वहां नई खदानों की अनुमति देना अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करता है। यही वजह है कि यह मामला अब गंभीर डोलोमाइट खदान ग्रामीणों के लिए आरपार की जंग बन चुका है।
बंद खदानों की हालत देखी है कभी
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सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस क्षेत्र में 6–7 साल से चल रही खदानों में से कई बंद हो चुकी हैं।
लेकिन बंद खदानों के गहरे गड्ढे आज भी खुले पड़े हैं। कहीं पानी भरा है, कहीं जहरीली धूल उड़ रही है।
न तो खदानों की रिक्लेमेशन हुई, न ही पर्यावरण सुधार के कोई उपाय किए गए।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब पुराने खदानों की जिम्मेदारी तक नहीं निभाई गई तो नई खदानों की अनुमति किस आधार पर दी जा रही है।
बीमारी, धूल और बर्बाद होती खेती
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ग्राम बोंदा के तोषराम पटेल और ग्राम नौघटा के लखन पटेल बताते हैं कि खदानों और क्रशर उद्योगों से निकलने वाली धूल ने पूरे इलाके की हवा को जहरीला बना दिया है। लोगों को सांस लेने में तकलीफ, खांसी और फेफड़ों की बीमारी बढ़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि इस क्षेत्र में सिलिकोसिस जैसी घातक बीमारी का खतरा मंडरा रहा है। इतना ही नहीं, खदानों की खुदाई से भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। नदी-नाले सूख रहे हैं और खेतों की उपज लगातार कम हो रही है। धान उत्पादन में गिरावट से किसानों की आर्थिक कमर टूट गई है। इन हालातों में नई खदानों की मंजूरी देना ग्रामीणों के भविष्य को दांव पर लगाने जैसा है।
सवालों के घेरे में शासन – प्रशासन
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अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन और संबंधित विभाग सचमुच इस क्षेत्र की स्थिति से अनजान हैं, या फिर जानबूझकर आंखें बंद किए बैठे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर इसी तरह खदानों को मंजूरी मिलती रही तो आने वाले कुछ वर्षों में यह पूरा इलाका प्रदूषण और बीमारी का हॉटस्पॉट बन जाएगा। अगर सरकार और प्रशासन ने समय रहते इस डोलोमाइट खदान विवाद को गंभीरता से नहीं लिया तो यह मामला बड़े जन आंदोलन में बदल सकता है।
ग्रामीण बोले- यह खनिज माफिया का खेल है
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ग्राम नौघटा के सत्यनारायण पटेल का कहना है कि पिछले साल छेलफोरा की खदान के लिए हुई जनसुनवाई में ग्रामीणों ने भारी विरोध किया था और पर्यावरण प्रदूषण का मुद्दा उठाया था।
इसके बावजूद अब फिर से नई खदानों की तैयारी शुरू कर दी गई है। उनका कहना है कि यह साफ दिखाता है कि प्रशासन जनता की नहीं बल्कि खनिज माफिया की सुन रहा है।
“हमारे बच्चों का भविष्य मत बेचो”
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बिलाईगढ़-अ क्षेत्र के सरपंच भुवन पटेल का कहना है कि क्रशर उद्योगों और खदानों ने पहले ही लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। धूल इतनी ज्यादा है कि घरों की छतें और खेत तक सफेद परत से ढक जाते हैं। पीने का पानी दूषित हो रहा है, फसलें खराब हो रही हैं और लोग बीमार पड़ रहे हैं। ऐसे में बिना वैज्ञानिक जांच और पर्यावरण सुधार के नई खदानें खोलना पूरी तरह जनविरोधी फैसला होगा।



