धान की फसल में सफेद और भूरा माहू का प्रकोप, सरना धान के किसान परेशान

सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला क्षेत्र में इन दिनों धान की फसल में सफेद माहू और भूरा माहू यानी फुदका की समस्या सामने आ रही है। क्षेत्र में बड़ी संख्या में किसान धान की खेती करते हैं। लगातार हो रही बारिश से किसानों में खुशी है, क्योंकि वर्तमान समय में धान की फसल को पर्याप्त पानी की आवश्यकता है। हालांकि, बारिश के बीच कुछ खेतों में कीट प्रकोप बढ़ने से किसान चिंतित नजर आ रहे हैं। खासकर सरना धान की फसल में माहू का प्रकोप अधिक देखा जा रहा है।
किसानों के अनुसार इस बार धान की फसल में अन्य रोगों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम है, लेकिन सरना धान में माहू की समस्या अधिक दिखाई दे रही है। मौसम में लगातार बदलाव और नमी को भी किसान इसके प्रमुख कारणों में से एक मान रहे हैं। वहीं, छोटे अवधि वाले धान अब निकलने की अवस्था में पहुंच रहे हैं, ऐसे में किसान फसल को कीटों से बचाने के लिए सतर्कता बरत रहे हैं।
वरिष्ठ कृषि विस्तारक अधिकारी बसंत नायक ने किसानों को माहू से बचाव के लिए खेतों की नियमित निगरानी करने और आवश्यकता पड़ने पर अनुशंसित कीटनाशकों का उपयोग करने की जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि फुदके धान के पौधों के निचले हिस्से में रहकर रस चूसते हैं। इसके कारण पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और अधिक प्रकोप होने पर फसल को नुकसान पहुंच सकता है।
इन कीटनाशकों के उपयोग की जानकारी
कृषि विभाग के अनुसार फुदका नियंत्रण के लिए ट्राइफ्लूमेज़ोपिरिम 10 प्रतिशत एससी (Triflumezopyrim) की 94 मिलीलीटर मात्रा प्रति एकड़ उपयोग की जा सकती है। यह लंबे समय तक नियंत्रण में प्रभावी माना जाता है तथा प्रारंभिक एवं मध्यम अवस्था में उपयोगी है।
इसी प्रकार पाइमेट्रोज़िन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी (Pymetrozine) की 120 से 150 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ तथा डाइनोटेफ्यूरॉन 20 प्रतिशत एसजी (Dinotefuran) की 80 से 100 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ उपयोग की जानकारी दी गई है। पाइमेट्रोज़िन फुदके की रस चूसने की प्रक्रिया को रोकने में प्रभावी है, जबकि डाइनोटेफ्यूरॉन तेजी से असर दिखाने वाला कीटनाशक है।
पौधे के निचले हिस्से में करें छिड़काव
कृषि विभाग ने किसानों को दवा का छिड़काव करते समय विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। फुदके सामान्यतः पौधे के निचले भाग में तने और पानी की सतह के आसपास पाए जाते हैं। इसलिए स्प्रे नोजल को पौधों के आधार की ओर रखते हुए छिड़काव करना जरूरी बताया गया है।
प्रति एकड़ कम से कम 150 से 200 लीटर पानी का उपयोग करने की सलाह दी गई है, ताकि दवा पौधों के तने और निचले हिस्से तक अच्छी तरह पहुंच सके। विभाग ने साइपरमेथ्रिन और डेल्टामेथ्रिन जैसे सिंथेटिक पाइरेथ्रोइड्स के अनावश्यक इस्तेमाल से बचने की सलाह भी दी है, क्योंकि इनके प्रयोग से फुदका के पुनरुत्थान की स्थिति बन सकती है।
बरमकेला क्षेत्र में फिलहाल किसान बारिश से राहत महसूस कर रहे हैं, लेकिन सरना धान में बढ़ते माहू के प्रकोप को लेकर चिंतित हैं। किसानों का कहना है कि समय रहते कीट नियंत्रण किया गया तो धान की फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। कृषि विभाग ने भी किसानों से खेतों की नियमित निगरानी करने और कीट प्रकोप दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही दवा का उपयोग करने की अपील की है।



